गणगौर पर्व: इतिहास, महत्व, पूजा विधि और परंपराएं

By | March 19, 2026

गणगौर का परिचय

गणगौर भारत का एक प्रमुख और अत्यंत पारंपरिक त्योहार है, जो विशेष रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती (गौरी) को समर्पित होता है, जहाँ “गण” का अर्थ भगवान शिव और “गौर” का अर्थ माता पार्वती से लिया जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से महिलाओं का पर्व माना जाता है, जिसमें विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित लड़कियाँ अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए माता गौरी की पूजा करती हैं।

गणगौर का यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रेम, समर्पण और वैवाहिक संबंधों की मजबूती का भी प्रतीक है। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा धारण करती हैं, हाथों में मेहंदी लगाती हैं और माता गौरी की सुंदर मूर्तियों को सजाकर उनकी पूजा करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में एकत्र होकर लोकगीत गाती हैं और पूरे उत्साह के साथ इस पर्व को मनाती हैं।

यह त्योहार वसंत ऋतु में मनाया जाता है, जो प्रकृति में नवजीवन, हरियाली और खुशहाली का संकेत देता है। इसलिए गणगौर को समृद्धि, उन्नति और नई शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है। विशेष रूप से राजस्थान में यह पर्व बड़े भव्य रूप में मनाया जाता है, जहाँ शोभायात्राएं, मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस प्रकार गणगौर न केवल एक धार्मिक पर्व है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का भी सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।

गणगौर कब और कैसे मनाया जाता है

गणगौर पर्व होली के अगले दिन से प्रारंभ होता है और लगभग 16 से 18 दिनों तक बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह मुख्य रूप से हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास में आता है, जो वसंत ऋतु का समय होता है और नई शुरुआत, हरियाली तथा समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस पूरे अवधि में महिलाएं प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके माता गौरी की पूजा करती हैं और व्रत रखती हैं। वे मिट्टी या लकड़ी की बनी हुई शिव-गौरी की मूर्तियों को सजाती हैं और उन्हें फूल, मेहंदी, सिंदूर तथा श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करती हैं।

इस दौरान महिलाएं समूह में एकत्र होकर पारंपरिक लोकगीत गाती हैं, जिनमें माता गौरी और भगवान शिव के विवाह और प्रेम का वर्णन होता है। कई स्थानों पर महिलाएं सिर पर कलश रखकर जल लाती हैं, जिसे पूजा में उपयोग किया जाता है। यह पूरे उत्सव को और भी भक्तिमय और पारंपरिक बनाता है।

अंतिम दिन, जिसे गणगौर का मुख्य दिन कहा जाता है, विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस दिन महिलाएं पूरे विधि-विधान के साथ माता गौरी की आराधना करती हैं और उनकी सुंदर सजी हुई मूर्तियों की शोभायात्रा निकाली जाती है। इस शोभायात्रा में गीत-संगीत, नृत्य और पारंपरिक वेशभूषा का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। अंत में मूर्तियों का जल में विसर्जन किया जाता है, जिससे इस पर्व का समापन होता है। इस प्रकार गणगौर न केवल भक्ति का पर्व है, बल्कि यह सांस्कृतिक उत्साह और सामूहिक आनंद का भी प्रतीक है।

गणगौर और होली का संबंध

गणगौर और होली का संबंध बहुत ही गहरा और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। गणगौर का त्योहार होली के तुरंत बाद शुरू होता है, जो इस बात का प्रतीक है कि रंगों, उत्साह और उल्लास के पर्व के बाद अब श्रद्धा, संयम और भक्ति का समय आता है। होली जहां बुराई पर अच्छाई की जीत, आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश देती है, वहीं गणगौर विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण पर्व है, जो वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि, प्रेम, समर्पण और सौभाग्य का प्रतीक है।

गणगौर में महिलाएं माता गौरी (पार्वती) और भगवान शिव की पूजा करती हैं। अविवाहित लड़कियां अच्छे वर की कामना करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए व्रत रखती हैं। इस प्रकार होली के रंगों से भरे उल्लास के बाद गणगौर का पर्व जीवन में स्थिरता, प्रेम और आध्यात्मिकता को महत्व देने का संदेश देता है। दोनों त्योहार मिलकर भारतीय संस्कृति में आनंद और आस्था का सुंदर संतुलन प्रस्तुत करते हैं।

गणगौर के प्रमुख अनुष्ठान

गणगौर के दौरान कई विशेष और पारंपरिक अनुष्ठान बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ किए जाते हैं। इस पर्व की शुरुआत से ही महिलाएं मिट्टी या लकड़ी की भगवान शिव और माता गौरी की मूर्तियां बनाती हैं या बाजार से लाकर उन्हें सुंदर तरीके से सजाती हैं। इन मूर्तियों को रंग-बिरंगे वस्त्र, आभूषण और फूलों से सजाया जाता है, जो भक्ति और सौंदर्य का प्रतीक होता है।

पूरे उत्सव के दौरान महिलाएं प्रतिदिन इन मूर्तियों की पूजा करती हैं और उन्हें फूल, मेहंदी, सिंदूर, काजल, चूड़ियां, बिंदी और अन्य श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करती हैं। यह अर्पण माता गौरी को प्रसन्न करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं सुबह जल्दी उठकर पास के कुएं, तालाब या नदी से सिर पर कलश रखकर जल लाती हैं, जिसे वे पूजा में उपयोग करती हैं। यह परंपरा अनुशासन, श्रद्धा और सामूहिक भागीदारी को दर्शाती है।

इसके अलावा, महिलाएं समूह में एकत्र होकर पारंपरिक गीत गाती हैं, व्रत रखती हैं और पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। अंतिम दिन गणगौर का विशेष महत्व होता है, जब सजी-धजी मूर्तियों की शोभायात्रा निकाली जाती है। इसके बाद पूरे विधि-विधान के साथ इन मूर्तियों का जल में विसर्जन किया जाता है। यह विसर्जन केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के चक्र, आस्था और पुनर्निर्माण का प्रतीक भी माना जाता है। इस प्रकार, गणगौर के अनुष्ठान न केवल धार्मिक आस्था को प्रकट करते हैं, बल्कि हमारी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को भी जीवंत बनाए रखते हैं।

गणगौर के लोकगीत और नृत्य

 

 

विभिन्न राज्यों में गणगौर

विभिन्न राज्यों में गणगौर का पर्व अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है, लेकिन इसकी आस्था और महत्व हर जगह समान रहता है। गणगौर मुख्य रूप से राजस्थान में बड़े धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहां यह पर्व महिलाओं के लिए विशेष सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व रखता है। इसके अलावा मध्य प्रदेश और गुजरात में भी इसे श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।

राजस्थान के प्रमुख शहरों जैसे जयपुर और उदयपुर में गणगौर का उत्सव बेहद भव्य रूप में देखने को मिलता है। यहां सजी-धजी गणगौर की प्रतिमाओं की विशाल शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, जिनमें महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होती हैं। इन शोभायात्राओं में लोकनृत्य, लोकसंगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनें पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देती हैं।

उदयपुर में तो यह पर्व झीलों के किनारे विशेष रूप से आकर्षक रूप में मनाया जाता है, जहां गणगौर की सजी हुई प्रतिमाओं को नावों के माध्यम से ले जाया जाता है। वहीं जयपुर में शाही अंदाज में निकलने वाली गणगौर की शोभायात्रा पर्यटकों के लिए खास आकर्षण का केंद्र होती है। इन आयोजनों को देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं, जिससे यह पर्व पर्यटन के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बन जाता है।

इस प्रकार, विभिन्न राज्यों में मनाया जाने वाला गणगौर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारत की विविधता, सांस्कृतिक समृद्धि और परंपराओं की खूबसूरती को भी दर्शाता है।

गणगौर और श्रृंगार का महत्व

गणगौर के पर्व में श्रृंगार का विशेष और गहरा महत्व होता है। यह केवल बाहरी सजावट नहीं, बल्कि आस्था, सौभाग्य और स्त्री शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर महिलाएं पूरे मन और श्रद्धा के साथ 16 श्रृंगार (सोलह श्रृंगार) करती हैं और माता गौरी की पूजा करती हैं। इन श्रृंगारों में मेहंदी, बिंदी, चूड़ियां, सिंदूर, काजल, मांग टीका, नथ, पायल, हार और विभिन्न आभूषण शामिल होते हैं, जो स्त्री के सौंदर्य और गरिमा को दर्शाते हैं।

विवाहित महिलाओं के लिए यह श्रृंगार उनके सुहाग, पति की लंबी आयु और वैवाहिक जीवन की खुशहाली का प्रतीक होता है। वहीं अविवाहित लड़कियां भी पूरे उत्साह के साथ श्रृंगार करती हैं और माता गौरी से अच्छे जीवनसाथी की कामना करती हैं। मेहंदी और चूड़ियों का विशेष महत्व होता है, क्योंकि इन्हें शुभता और समृद्धि का संकेत माना जाता है।

गणगौर के दौरान महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर एकत्रित होती हैं, जिससे पूरा वातावरण रंगीन और उत्सवमय हो जाता है। यह श्रृंगार केवल व्यक्तिगत सौंदर्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करता है। इस प्रकार, गणगौर में किया जाने वाला श्रृंगार महिलाओं की आस्था, प्रेम, समर्पण और उनकी सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जुड़ाव को सुंदर तरीके से अभिव्यक्त करता है।

गणगौर का आधुनिक महत्व

गणगौर का आधुनिक महत्व आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है जितना पहले हुआ करता था। बदलती जीवनशैली और शहरीकरण के बावजूद यह त्योहार लोगों को अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जोड़े रखने का एक सशक्त माध्यम बना हुआ है। गणगौर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह सामाजिक जुड़ाव, पारिवारिक मूल्यों और सामूहिक उत्सव की भावना को भी मजबूत करता है।

आज के शहरी जीवन में भी महिलाएं इस पर्व को पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाती हैं। वे पारंपरिक वेशभूषा पहनकर, समूह में इकट्ठा होकर पूजा-अर्चना करती हैं, लोकगीत गाती हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं। कई जगहों पर सोसाइटी और समुदाय स्तर पर गणगौर के आयोजन किए जाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भी इन परंपराओं से परिचित हो सके और उन्हें आगे बढ़ा सके।

इसके अलावा, गणगौर का पर्यटन के क्षेत्र में भी विशेष महत्व बढ़ गया है, खासकर राजस्थान में। यहां के शहर जैसे जयपुर और उदयपुर में आयोजित भव्य शोभायात्राएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक उत्सव देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इससे न केवल स्थानीय कला और संस्कृति को बढ़ावा मिलता है, बल्कि आर्थिक विकास में भी योगदान होता है।

इस प्रकार, आधुनिक युग में गणगौर केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक एकता और परंपराओं के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका है।

 गणगौर का इतिहास

गणगौर का इतिहास प्राचीन हिंदू परंपराओं और पौराणिक कथाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह पर्व मुख्य रूप से माता पार्वती (गौरी) और भगवान शिव की पूजा से संबंधित है, जिन्हें आदर्श दांपत्य जीवन और अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी इस अटूट भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी दिव्य कथा की स्मृति और सम्मान में गणगौर का पर्व मनाया जाता है।

“गणगौर” शब्द भी विशेष अर्थ रखता है— “गण” का संबंध भगवान शिव से और “गौर” का संबंध माता गौरी से माना जाता है। इस प्रकार यह पर्व शिव-पार्वती के पवित्र मिलन और वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि का प्रतीक बन गया है।

यह त्योहार वसंत ऋतु में मनाया जाता है, जब प्रकृति में नवजीवन का संचार होता है। पेड़-पौधे हरे-भरे हो जाते हैं, खेतों में नई फसल तैयार होती है और वातावरण में उत्साह और ऊर्जा का संचार होता है। इसलिए गणगौर को नई शुरुआत, समृद्धि और खुशहाली का भी प्रतीक माना जाता है।

इतिहास के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह पर्व विशेष रूप से राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में सदियों से मनाया जा रहा है, जहां यह लोकजीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। समय के साथ इसकी परंपराएं और रीति-रिवाज पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते रहे हैं, जिससे यह आज भी उतनी ही श्रद्धा और भव्यता के साथ मनाया जाता है। इस प्रकार, गणगौर का इतिहास केवल एक धार्मिक कथा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत, आस्था और जीवन मूल्यों का भी प्रतीक है।

 गणगौर का महत्व

गणगौर का धार्मिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत विशेष महत्व है। यह पर्व केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन के मूल्यों—प्रेम, विश्वास, समर्पण और सौहार्द—को मजबूत करने का एक माध्यम है। गणगौर मुख्य रूप से माता पार्वती (गौरी) और भगवान शिव की आराधना से जुड़ा हुआ है, जिन्हें आदर्श दांपत्य जीवन का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक दृष्टि से, यह पर्व महिलाओं की गहरी आस्था और श्रद्धा को दर्शाता है। विवाहित महिलाएं पूरे विधि-विधान के साथ व्रत रखकर माता गौरी की पूजा करती हैं और अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। वहीं अविवाहित लड़कियाँ भी पूरे उत्साह और विश्वास के साथ व्रत रखती हैं, ताकि उन्हें योग्य और आदर्श जीवनसाथी प्राप्त हो सके। इस प्रकार यह पर्व जीवन में प्रेम और संबंधों की पवित्रता को उजागर करता है।

सामाजिक दृष्टि से भी गणगौर का महत्व बहुत बड़ा है। यह त्योहार महिलाओं को एक मंच प्रदान करता है, जहां वे एक साथ मिलकर पूजा करती हैं, लोकगीत गाती हैं, नृत्य करती हैं और अपनी भावनाओं को साझा करती हैं। इससे आपसी प्रेम, सहयोग और सामाजिक एकता की भावना मजबूत होती है। साथ ही, यह पर्व हमारी सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी कार्य करता है।

इसके अतिरिक्त, गणगौर महिलाओं की शक्ति, धैर्य और समर्पण का भी प्रतीक है। यह उन्हें अपने जीवन में सकारात्मकता, धैर्य और संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार, गणगौर केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक ऐसा पर्व है जो जीवन के विभिन्न पहलुओं—धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक—को सुंदर तरीके से जोड़ता है।

पूजा विधि

गणगौर की पूजा विधि अत्यंत पवित्र, विधि-विधान से युक्त और श्रद्धा से भरी होती है। इस दौरान महिलाएं प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ, पारंपरिक वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद वे माता पार्वती (गौरी) और भगवान शिव की प्रतिमा या मिट्टी की मूर्तियों की स्थापना करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं स्वयं इन मूर्तियों को बनाकर उन्हें सुंदर तरीके से सजाती हैं।

पूजा के दौरान महिलाएं माता गौरी को फूल, सिंदूर, मेहंदी, चूड़ियां, काजल, बिंदी और अन्य श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करती हैं। यह अर्पण उनके सौभाग्य, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना का प्रतीक होता है। कुछ स्थानों पर महिलाएं सिर पर कलश रखकर जल लाती हैं, जिसे पूजा में उपयोग किया जाता है। यह परंपरा अनुशासन और भक्ति का सुंदर उदाहरण है।

पूरे गणगौर उत्सव के दौरान महिलाएं व्रत रखती हैं, पारंपरिक लोकगीत गाती हैं और समूह में एकत्र होकर पूजा-अर्चना करती हैं। यह सामूहिक पूजा न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाती है, बल्कि आपसी प्रेम और सामाजिक एकता को भी मजबूत करती है।

अंतिम दिन का विशेष महत्व होता है, जब सजी-धजी गणगौर की मूर्तियों की भव्य शोभायात्रा (जलूस) निकाली जाती है। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजकर गीत गाती हुई इस यात्रा में शामिल होती हैं। अंत में पूरे विधि-विधान के साथ इन मूर्तियों का जल में विसर्जन किया जाता है, जो आस्था, समर्पण और जीवन के चक्र का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार, गणगौर की पूजा विधि न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह हमारी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं की सुंदर अभिव्यक्ति भी है।

सांस्कृतिक परंपराएं

गणगौर के दौरान सांस्कृतिक परंपराओं का विशेष महत्व होता है, जो इस पर्व को और भी रंगीन, जीवंत और आकर्षक बना देता है। इस अवसर पर लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक रीति-रिवाजों का सुंदर संगम देखने को मिलता है। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा जैसे लहंगा-चुनरी या साड़ी पहनकर समूह में एकत्र होती हैं, गीत गाती हैं और पूरे उत्साह के साथ इस पर्व को मनाती हैं। इन लोकगीतों में माता गौरी और भगवान शिव की महिमा, प्रेम और दांपत्य जीवन की पवित्रता का वर्णन किया जाता है।

विशेष रूप से राजस्थान में गणगौर का उत्सव अत्यंत भव्य और आकर्षक रूप में मनाया जाता है। यहां की सांस्कृतिक झलक इस पर्व के दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जयपुर, उदयपुर और अन्य शहरों में शाही अंदाज में शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, जिनमें सजी-धजी गणगौर की प्रतिमाएं, पारंपरिक वाद्ययंत्र, लोकनृत्य और रंग-बिरंगे परिधान पूरे माहौल को उत्सवमय बना देते हैं।

इसके साथ ही कई स्थानों पर मेलों का आयोजन भी किया जाता है, जहां लोग पारंपरिक वस्तुएं, हस्तशिल्प और स्थानीय खान-पान का आनंद लेते हैं। ये मेले न केवल मनोरंजन का माध्यम होते हैं, बल्कि स्थानीय कला और संस्कृति को बढ़ावा देने का भी कार्य करते हैं।

इस प्रकार, गणगौर की सांस्कृतिक परंपराएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह समाज की एकता, परंपराओं की निरंतरता और भारतीय संस्कृति की समृद्धि को भी दर्शाती हैं।

निष्कर्ष

गणगौर पर्व प्रेम, श्रद्धा, संस्कृति और परंपरा का एक अनूठा और सुंदर संगम है। यह त्योहार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक एकता, पारिवारिक मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत को भी सशक्त रूप से दर्शाता है। इस पर्व के माध्यम से लोग विशेष रूप से महिलाएं अपनी गहरी श्रद्धा और समर्पण को माता पार्वती (गौरी) और भगवान शिव के प्रति व्यक्त करती हैं।

गणगौर हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में प्रेम, विश्वास और समर्पण का कितना महत्व है। यह पर्व वैवाहिक संबंधों की मजबूती, आपसी समझ और सम्मान को बढ़ावा देता है। साथ ही, यह समाज में सहयोग, एकता और भाईचारे की भावना को भी प्रोत्साहित करता है।

आज के आधुनिक समय में भी गणगौर अपनी परंपराओं और मूल्यों के साथ जीवित है, जो हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। यह त्योहार नई पीढ़ी को हमारी समृद्ध संस्कृति से परिचित कराता है और उसे आगे बढ़ाने का संदेश देता है। इस प्रकार, गणगौर केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत है, जो हमें प्रेम, आस्था और समर्पण के साथ जीना सिखाती है।

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